एक ऐसा आदमी जिसने महिलाओं की सबसे बड़ी मुश्किल का सबसे सस्ता हल खोज निकाला

एक देश जहां महिलाएं अपनी माहवारी को न सिर्फ़ लोगों से छुपाती हैं। बल्कि उस दौरान सुरक्षित स्वास्थ्य का साधन भी नहीं जुटा पातीं एक पुरुष उनकी ज़रुरत और सुविधा के मुताबिक़ " सैनिटरी पैड " बनाने की खोज पर निकल जाता है, यह हर्ष मिश्रित एक आश्चर्य पैदा करता है, लोगों ने उसके इस जूनून को पागलपन कहकर मज़ाक उड़ाया. पत्नी ने उसकी इस खोज से हो रही जग हंसाई के कारण उसे छोड़ दिया पर वो नहीं रुका. उसने बनाया देश का सबसे हाइजीनिक और सस्ता सैनिटरी पैड. आज लोग उसे " मेनसुरेशन मैन " Arunachalam  Muruganantham " के नाम से जानते हैं ।  




आजकल सोशल मीडिया में उसकी कहानी वायरल हो रही है. एक शख्स आम हो कर भी बेहद ख़ास हो गया है, अरुणाचलम मुरुगंथनम शादी के बाद अपनी पत्नी को छोटी - छोटी खुशियां देना चाहता था. उसे लगा कि पत्नी उससे कुछ छुपा रही है, ज़िद थी जानने की आख़िर क्या और क्यों उससे कुछ छुपाया गया था ?

फ़िर उसे पता चला कि उसकी पत्नी पीरियड्स के दौरान पुराने कपड़े का इस्तेमाल किया करती है, क्योंकि वह महंगे  " सैनिटरी पैड " नहीं ख़रीद सकती थीं.


अरुणाचलम ने निश्चय किया कि वो अपनी पत्नी के लिए ख़ुद पैड बनाएंगे यह उनके लिए तोहफ़े से कम नहीं होगा एक छोटा सा काम करने की धुन ऐसी सवार हुई, कि उन्होंने सबसे सस्ते " सैनिटरी पैड " बना डाले ,इसके बदले में उन्हें बहुत कुछ गंवाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी



सफर लंबा था...






बाजार में उपलब्ध दूसरे " सैनिटरी पैड " की ही तरह मुरुगा एक सस्ता पैड बनाना चाहते थे, इसके लिए वो कॉटन रोल लाए और उन्होंने इस पर काम करना शुरू कर दिया, दो दिन में उन्होंने एक  " सैनिटरी पैड " तैयार करके पत्नी को इस्तेमाल करने को दिया ,पत्नी ने कहा कि वो कपड़ा ही इस्तेमाल करेंगी, क्योंकि ये पैड बिलकुल बेकार है, अब मुरुगा अलग - अलग मैटीरियल के साथ एक्सपेरिमेंट करने लगे,  उन्होंने अपने गांव के ही एक विश्वविद्यालय की मेडिकल छात्राओं को इन पैड्स को टेस्ट करने को कहा. छात्राओं ने उन्हें इस्तेमाल तो किया, लेकिन शर्म की वजह से वो उसके बारे में ज्यादा कुछ बता नहीं पाईं.

फिर लिया एक अजीब फैसला ...

अरुणाचलम ने फिर  एक हैरान करने वाला फैसला लिया. उन्होंने खुद उस  " सैनिटरी पैड " को पहन कर जांच करने की ठानी. एक रबर के ब्लैडर से नकली यूट्रस बनाया, जिसे  " सैनिटरी पैड " से जोड़ा, और ब्लैडर में जानवर का रक्त भर लिया. दबाव पड़ने पर रक्त स्राव वैसा ही होता,  जैसा माहवारी में होता है. वो ब्लैडर पहनकर ही रहते,  जिससे उनके शरीर से दुर्गंध आती और कपड़ों पर खून के दाग लग जाते.  लोग उन्हें पागल कहने लगे. लोगों की बातें बर्दाश्त से बाहर हो गईं, तो पत्नी उन्हें छोड़ कर चली गईं. पत्नी को लगा कि वो चली जाएंगी, तो मुरुगा ये सब करना बंद कर देंगे. लेकिन वो जुटे रहे. अपने काम में सफलता तो नहीं, लेकिन तलाक़ का नोटिस ज़रूर मिल गया.



आखिरकार मंजिल मिल ही  गई ...





" सैनिटरी पैड " के लिए सही मैटेरियल खोजने में उन्हें 2- साल लग गए. उन्होंने करीब 4-सालों में तीन मशीनें भी तैयार कीं, जिनका इस्तेमाल करके कोई भी महिला अच्छे और सस्ते  " सैनिटरी पैड " तैयार कर सकती है. बाजार में मिलने वाले  " सैनिटरी पैड " की आधी कीमत में ये  " सैनिटरी पैड " तैयार हो गए.



महिलाओं को मिले रोजगार ...






अब महिलाएं उनकी बनाई मशीनें खरीद सकती हैं, और खुद के " सैनिटरी पैड " बनाकर बेच सकती हैं. मुरुगा की इन मशीनों ने गांव में रहने वाली महिलाओं को रोजगार प्रदान किए. देश के 27- राज्यों में 1300 मशीनों पर ये  " सैनिटरी पैड " तैयार किए जाते हैं, मुरुगा ने अब ये " सैनिटरी पैड " दूसरे देशों में निर्यात भी करने शुरू कर दिए हैं, कई कंपनियों ने मुरुगा से उनकी मशीनें खरीदनी चाहीं , लेकिन वो अपनी मशीनें केवल महिलाओं की स्वयं सेवी संस्थाओं को ही देते हैं.





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